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Sunday, January 11, 2015

दुख निवारक हमारे वक्त़ में


-संजीवकुमार

बचपन से हम पढ़ते आये हैं कि मनुश्य एक सामाजिक प्राणी हैलेकिन क्याआज यकीन के साथ हम कह  सकते हैं कि मनुश्य कि सामाजिकताआज बरकरार हैं।अभीकुछ दिन पहले की बात है, हमारे पड़ोस में एक किषोरी रहती है वो मेरी पत्नीसे कह रही थी कि आन्टी क्या हम लोग बड़ी पार्टी न्यू इयर इव परओर्गनाईज नहीं करसकते जिसमें पूरे एल.आइ.जी. के लोग भागीदारी करें इस पर मैं सोचने लगा एल.आइ.जी. में पूरे 576 फैल्टस हैं उसमें आधा भी खाली माने तो 288 फैल्टस। एक फैल्ट में चार लोग रहतें हेें तो कुल मिलाकर तकरीबन 1000 लोग होगें इनके लिए पार्टी ओर्गनाईज करने का किसकेपास कितना समय है और कौन सी जगह पर यह पार्टी ओर्गनाईज होसकती है इसलिए मैं सोचने पर मजबुर हो गया कि आज शहरों में संस्थाएॅ तो बहुत सारी बनी हुई है जैसे रेजिडेन्ट वेलफेयर एसोसिएशन वगैरह लेकिन क्या वे संस्थाएॅ आज मनुश्य के जीवन में जो एकाकीपन है उसको दूर कर पाती हैं।


मुझे एक और वाकया यादआया जो मेरे एक मित्र ने सुनाया। मेरे मित्र दूसरी मंजिल पर रहते हैं और ठीक उनके उपर तीसरी मंजिल पर रहने वाले व्यक्ति की हार्टसर्जरी हुई यानि कि वह गंभीर बीमारीसेजुझरहेथेऔरमेरेमित्र को यह बात उनके हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के तीन-चार दिनबाद पता चला जब बच्चे नीचे खेल रहे थे और शोर हो रहा था तो बीमार व्यक्ति के परिवार वाले नेकहा कि षोर मत मचाओ यहां कोई बीमार है।
इन परिस्थितियों पर दो तरह की प्रतिक्रियाआती है एक तो वह जो मेरे मित्र ने दी कि काम से रिटायर होने के बाद वो गांव जा कर ही रहेगें क्योंकि वहां एक पहचानहै ,वहां के लोगों में इतनी सामाजिकता है। हम यह सोचने पर मजबुर हो जाते हैं कि पहले वाली ग्राम व्यवस्था ही ठीक थी।कुछ लोग इस प्रयास में लगे है कि ग्रामव्यवस्था ही बनी रहे या जितनी बची है उसी में वापस जाया जाए। लेकिन क्या गांव में रहने वाले भी ऐसा ही सोचते हैं या उन्हें वही सारी सुविधाएं जो षहर में उपलब्ध हैं वो पाना चाहते है और हमारी सरकार आज षहरीकरण का प्रोजेक्ट ले रही हैं।

हमारा समाज संक्रमण काल से गुजर रहा हैं इसमें दो तरह के विकल्प पैदा होते हैं। एक जो समाज को पुरानी दुनिया वापस दिलाने का वादा करते है यानी कि वैसा कुछ करते हैं कि वो पुरानीदूनिया की, लोगों को अच्छी लगने वाली चीजें दिलाते है वो आसान भी होता है। आज जो लोग रोजगार पाने के लिए षहरआते हैऔर वो सारी भौतिक सुविधाएं हासिल करना चाहतें है, उन्हें दिन-रात एक करनी पड़ती हैं और सामाजिकता त्यागनी पड़ती है, उनके पास सोने, खाने-पीने के अलावा किसी और काम के लिए समय  ही नहीं होता। एक आदमी दो-दो तीन-तीन नौकरी करता है या एक ही नौकरीमें दो-दो तीन-तीन डूयूटी करता है। ऐसी अवस्था मे यदि आपकी गाड़ी सरपट पटरी पर चल रही है तब तक तो ठीक है गलती से यदि गाड़ी पटरी से उतर गर्इ्र् वजह कोई भी हो सकती है मानसिक, षारीरिक बीमारी या नौकरी का छूट जाना या कोई और वजह तो फिर शामत आना स्वाभाविक होता है।\

आपअपने इर्द-गिर्द वैसे ही गाड़ी सरपट दौड़ते देखेगें जिसको आप रोक नहीं पाएंगे औरअपने आपको अकेला पाएंगे, अपनी समस्या से जूझने के लिए तब षु़रू होती है षान्ति की खोज और आपको किसी बाबा की कृपा की जरूरत महसूस होती हैं। ऐसे छोटे-मोटे दुख  निवारक तो गली मुहल्ले में भी मिल जाते है जो धैर्यपूर्वक आपकी समस्या सुनते हैं और उचित अनुचित सलाहऔर नुस्खा बताते हैं। ये और बात है कि जब आपको  एक डाक्टर के इलाज से फायदा नहीं होता है तो आप दूसरे डाक्टर के पास जाते हैं।उसी तरह से  एक दुख निवारक से दूसरे दुखनिवारक के पास। ये तो निम्न मध्यम वर्ग की बात; स्थिति कमोवेष यही मध्य औरउच्चवर्ग की है।
जिन्दगी की आपा धापी में लगे रहते हूए आप इहलोक तो संवार लेते हैं लेकिन परलोक की चिंता सताती है, उनके लिए कई आश्रम खुले हैं, आश्रम वाले आपकी मदद परलोक सुधारने में तो करते ही हैं इहलोक सुधारने में भी काम आते हैं। जैसे बडे़-बड़े विवादों में मध्यस्थ की भूमिका में मिला-जुलाकर आज के समय में इनके लिए बहुत बड़ा बाजार हैं।आत्मा षुद्धि करण के नाम पर षांति के नाम पर और समस्यानिवारण के नाम पर।भविश्य में इनके लिए बाजार बढ़ने की संभावना अधिक है क्योंकि विकास का पहिया कितनो के अरमानों को कुचलेगा, कितनों को घाव देगा यह कहना मुष्किल नहीं हैं। ग्र्रामीण व्यवस्था को अभी बहुत सीमित होना है जो षहर से गांव आकर अपना अंितंम समय गुजारना चाहते हैं उनके लिए वह गांव बचेगा या नहीं यह समझना ज्यादा मुष्किल नहीं हैं।

जो लोग वैज्ञानिक द्वश्टिकोण रखते हैं और समझते हैं कि समाज का आगे बढ़ना तय है और विकास  के  रथको न तो रोका जा सकता है और न ही रोका जाना चाहिए, वैसे लोगों की संख्या बहुत ही नगण्य है।समाज की बढ़ती समस्या के समाधान के लिए जिस पैमाने की मषीनरी चाहिए वो  सरकार ही मुहैया करा सकती है औरसरकार में जिस तरह के लोग बैठे़ हैं, उसमें किस किस्म का समाधान मिलेगा यह समझना मुश्किल नहीं है। ऐसे में जनता को बाबाओं के षरण में ही जाना पडे़गा और किसी रामपाल को कोर्ट में हाजिर करने के लिए 26 करोड रूपया खर्च करना पड़ेगा। और ऐसे लोगअपनेआपकोकानून के उपर मानते हैं और इनके भक्तों की फौज आस्था के नाम पर कुछ भी कर सकती हैं। मगर क्या  ऐसे दुखनिवारकों से वास्तविक समाधान मयस्सर हो सकता है भला !                                               

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