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Wednesday, January 21, 2015

सुन्दरता का मिथक


-अंजलि सिन्हा

गुजरात के वारछा स्थित गंगबा विद्यालय की 5 वीं कक्षा की छात्रा 12 वर्षीय प्रेक्षा कापड़ा ने कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली। उसे उसके सहपाठी मोटी कह कर चिढ़ाते थे जिसके बारे में उसने अपने माता पिता को बताया था। ऐसी ही ख़बर कुछ समय पहले गाजियाबाद से आयी थी कि छठवीं एक छात्रा ने आग लगा कर इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसे लगता था कि वह काली है।

आखिर इन छोटे बच्चों के मन में यह पैमाना कैसे बन गया कि मोटे होना चिढ़ाने की बात हो सकती है या काली होने से किसी के व्यक्तित्व में कमी होती है। ध्यान देने लायक बात है कि यह सिलसिला महज भारत तक सीमित नहीं है, जैसे लन्दन से प्रसारित इस ख़बर ने उजागर किया था जहां 13 साल की एक स्कूली छात्रा ने अपने सहपाठियों द्वारा बदसूरत कहे जाने पर आत्महत्या कर ली थी। वहां पर भी किए गए अध्ययन में देखा गया कि सुन्दरता की ग्रंथि से दुखी होकर आत्महत्या की राह चुननेवाली या अपने आप को नुकसान पहुचानेवाली लड़कियों की संख्या में इधर बीच तेजी से इजाफा हो रहा है।

Sunday, January 11, 2015

दुख निवारक हमारे वक्त़ में


-संजीवकुमार

बचपन से हम पढ़ते आये हैं कि मनुश्य एक सामाजिक प्राणी हैलेकिन क्याआज यकीन के साथ हम कह  सकते हैं कि मनुश्य कि सामाजिकताआज बरकरार हैं।अभीकुछ दिन पहले की बात है, हमारे पड़ोस में एक किषोरी रहती है वो मेरी पत्नीसे कह रही थी कि आन्टी क्या हम लोग बड़ी पार्टी न्यू इयर इव परओर्गनाईज नहीं करसकते जिसमें पूरे एल.आइ.जी. के लोग भागीदारी करें इस पर मैं सोचने लगा एल.आइ.जी. में पूरे 576 फैल्टस हैं उसमें आधा भी खाली माने तो 288 फैल्टस। एक फैल्ट में चार लोग रहतें हेें तो कुल मिलाकर तकरीबन 1000 लोग होगें इनके लिए पार्टी ओर्गनाईज करने का किसकेपास कितना समय है और कौन सी जगह पर यह पार्टी ओर्गनाईज होसकती है इसलिए मैं सोचने पर मजबुर हो गया कि आज शहरों में संस्थाएॅ तो बहुत सारी बनी हुई है जैसे रेजिडेन्ट वेलफेयर एसोसिएशन वगैरह लेकिन क्या वे संस्थाएॅ आज मनुश्य के जीवन में जो एकाकीपन है उसको दूर कर पाती हैं।

Saturday, January 3, 2015

सावित्रीबाई फुले (January 3, 1831- March 10, 1897)


देश की पहली महिला अध्यापिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता.
लेकिन एक ऐसी महिला जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरूद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया पर उसे हिंदुस्तान ने भुला दिया.