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Saturday, December 20, 2014

प्रेम तथा जीवनसाथी चुनने का हक: स्त्राी सम्मान दिवस

           

दोस्तों,
कौन डरता है प्यार से?
यह सवाल पूछने का सबसे सही वक्त यही है जब एक ओर दक्षिणंथी ताकतें अपने सारे हथकंडे इस्तेमाल कर रही हैं कि किस तरह से प्यार करने के हक को, अपने जीवनसाथी को चुनने के हक को या अपनी यौनिकता को चुनने को चुनने के हक को छीन लिया जाए तो वहीं दूसरी ओर लगभग देश के हर कोने से खबरें आ रही हैं कि प्यार करने वालों ने इन धमकियों, नसीहतों को मानने से मना कर दिया है। और इसका विरोध करने के नित नए तरीके निकाल रहे हैं।


भारतीय सभ्यता-संस्कृति के नाम पर  औरतों से चुनाव का अधिकार छीनने की कोशिशे कामयाब नहीं हो पा रहीं। प्रेम है कि डरता ही नहीं न रूढि़वादी सोच लिए परिवार से, न समाज में चारों ओर फैले संस्कृति के ठेकेदारों से और न राज्य से। प्रेम दो या दो से ज्यादा इनसानों के बीच हमेशा रहा है और हमेशा रहेगा। हाल ही मौत अपनी मर्जी के गैरजातीय लड़के से विवाह करने वाली दिल्ली की भावना की हत्या की घटना से तो कम से कम यही लगता है। सम्मान के नाम पर की जाने वाली हत्याएं नहीं थम रहीं तो पीछे प्रेम करने वाले भी नहीं है। वे परिवार और समाज का विरोध करते हुए बेखौफ अपनी मर्जी से अंतधर्मीय अंतर्जातीय जीवनसाथी चुन रहे हैं।

कैसी विडंबना है कि एक ओर हमारा राज्य अपने सभी नागरिकों(जिसमें औरतें भी शामिल हैं) को 18 साल की उम्र में इस लायक मानता है कि वह अपना जीवनसाथी चुन सकते हैं यहां तक कि वे अपने देश का नेता चुन सकते हैं वहीं दूसरी ओर हाल यह है कि हमारे समाज में भारतीय सभ्यता-संस्कृति की दुहाई देकर उन्हें उनके निजी जीवन से जुड़े फैसले लेने से भी वंचित किया जा रहा है। यदि औरतें चुन ही लेंगी अपने साथी, यदि पुरुष-पुरुष को और स्त्री-स्त्री से प्रेम कर लेगी तो धरा कांप जाएगी और और सृष्टि समाप्त हो जाएगी यह डर यदि सता रहा है तो खजुराहो और अजंता-एलोरा और हमारा लिखित और मौखिक इतिहास इस तरह के प्रेम के उदाहरणों से भरा पडा है।

अंतर्जातीय और अंतर्धमीय विवाह एक प्रगतिशील और बराबरी आधारित समाज के निर्माण  में सहायक हैं न कि उसे पीछे ले जाने में। चुनाव के अधिकार की आजादी सभी को होनी चाहिए चाहे फिर वह जीवनसाथी को चुनने की आजादी हो या फिर अपने जीवन से जुड़े कोई और व्यक्तिगत फैसले हों, उसे लेने का हक तो जिसका जीवन है उसे ही मिलना चाहिए।

इस बार स्त्राी सम्मान दिवस का हमारा फोकस प्रेम तथा अपने साथी के चुनाव को लेकर स्त्रिायों के अधिकार की आजादी पर है।

ज्ञात हो कि ‘स्त्राी सम्मान दिवस’ का आयोजन पिछले पन्दरह सालों से स्त्राी मुक्ति संगठन द्वारा किया जा रहा है।
25 दिसम्बर को मनाया जानेवाला यह दिन भारत की महिलाओं का अपना दिन है। सन 1927 में इसी दिन डाॅ. भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व में एक बड़े अभियान की शुरूआत की गयी थी। दरअसल उसी साल मार्च महीने में (19-20 मार्च) उनके नेतृत्व में महाड़ के चवदार तालाब पर सभी लोगों ने मिल कर पानी पिया था। इस तालाब पर पानी लेना दलित समुदाय के लिए वर्जित था। 25 दिसम्बर को मनुस्मृति का प्रतीक के तौर पर दहन किया गया था। यह ऐसी किताब है जिसमें महिलाओं एवम दलितों के लिए ढेरों ऐसे नियम एवम निर्देश दिए गए हैं, जो इन दोनों को बराबरी का दर्जा, सम्मान एवम गरिमा से वंचित करते हैं। वैसे देखें तो कोईभी धर्म स्त्रिायों को बराबरी का दर्जा नहीं देता।

प्रमुख बात यह नहीं है कि किसी ग्रंथ को जलाया गया बल्कि महत्वपूर्ण है ऐसे सोच विचार एवम दर्शन का किसी भी रूप में प्रतिकार करना जो गैरबराबरी और तिरस्कार की भावना को जगह देता हो। एक ऐसे समय में ऐलान करके मनुस्मृति की शिक्षाओं और आचारसंहिता को मानने से इन्कार किया गया जब लगभग पूरे समाज में तथा शासकों के बीच उसकी स्वीकृति थी एवं पवित्रा ग्रंथ के रूप में उसकी मान्यता थी।

स्त्राी मुक्ति संगठन का मानना है कि हमारे समाज में महिलाओं को पूर्ण बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए तथा स्त्राी होने के नाते जो गैरबराबरी, अन्याय और हिंसा का सामना उसे करना पड़ता है, वह समाप्त होना चाहिए। साथ ही हम जाति उत्पीड़न और शोषण का भी विरोध करते हैं तथा उसके समूल नाश के लिए कार्य करते हैं।
आइए, आप भी स्त्रिायों की बराबरी, उनके सम्मान एवम हिंसारहित जीवन के उनके अधिकार पर, प्रेम तथा अपने साथी के चुनाव को लेकर उनकेे अधिकार की आजादी पर केन्द्रित हमारी मुहिम से जुड़ें।

स्त्राी मुक्ति संगठन

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