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Tuesday, May 13, 2014

जोहरा सहगल उर्फ़ ज़िन्दगी जिंदादिली का नाम है

रुपाली सिन्हा

एक प्रसिद्द उक्ति है .ज़िन्दगी लम्बी नहीं बड़ी होनी चहिये। लेकिन जोहरा आपा के सन्दर्भ में कहें तो उनकी ज़िन्दगी जितनी लम्बी होती गयी है उतनी ही बड़ी भी होती गयी है. एक पूरी सदी में फैला उनका जीवन कई पीढ़ियों का दस्तावेज़ है. भारतीय रंगमंच और सिनेमा की जानी मानी शख्सियत जोहरा सहगल ने अपनी आत्मकथा श्करीब सेश् में अपनी ज़िन्दगी का जो दिलचस्प खाका खींचा है वह उनके समय के समकालीन सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य के साथ-साथ इसकी बहुत सी परतों को उतार कर हमारे सामने रखती है. यह पुस्तक जोश से भरी कर्मठ और जुझारू महिला की दास्तान है जिसने ज़िन्दगी को अपनी शर्तों पर जिया उसे अपने हिसाब से गढा. ज़ाहिर है एक औरत के लिए यह सब आसान तो कतई नहीं रहा होगा। अभी भी उनमे जीने की चाह बरकरार है तभी तो वे लिखती हैं. क्या है ज़िन्दगी दिन बा दिन कमज़ोर होता शरीर,  चलने में होती लडखडाहट की वजह से मै लगभग रुक सी गयी हूँ, दाँत एक-एक करके साथ छोड़  रहे हैं, आँखों की रौशनी इतनी धीमी पड़ती जा रही है कि अक्सर लिखते वक्त मै पंक्तियाँ और शब्द देख नहीं पाती।   अगर मै धार्मिक होती तो यही समय था जब मै इश्वर पर विशवास करना शुरू करतीए लेकिन मै नहीं हूँ और इस बारे में बेइमान नहीं हो सकती. लेकिन उन लोगों से कोई नाराज़गी या दुश्मनी नहीं है जो किसी दैवी शक्ति के होने पर आस्था रखते हैंए अगर इससे उन्हें शांति मिलती है तो. आखिरकार धर्म एक खूँटी ही तो है जिस पर ज़रुरत के समय टेंगा जा सके. लेकिन मेरा विशवास है कि यह खूँटी, यह सहारा इंसान को अपने भीतर ही ढूँढना चाहिए। खुद से कहो कि तुममे तमाम मुसीबतों से पार पाने की ताक़त है और तुम पाओगे कि तुम्हारे अन्दर की ताक़त हर मुश्किल का सामना करने में मदद करेगी। जोहरा ने सच को जैसा देखा वैसा ही बोला। उनकी इस वस्तुपरक दृष्टि के कारण उनकी पुस्तक से एक ईमानदार और निष्पक्ष विवरण मिलता है जो उनके समय की एक तस्वीर है. 
       
जोहरा सहगल का जन्म 1912 में सहारनपुर में एक नवाब खानदान में हुआ. उनके माता पिता खुले और प्रगतिशील विचारों के थे। जोहरा बहुत कम उम्र की थी तभी माँ की मृत्यु हो गयी. पिता ने बच्चों की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई। जोहरा लिखती हैं, अपनी बेटियों की पढाई को लेकर मेरे माँ बाप की दूरदर्शिता तारीफ़ के काबिल थी. उन दिनों मुस्लिम परिवार के सभी लड़कों को अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भेज जाता थाए लेकिन लड़कियों को स्कूल भेजने की बात कोई सपने में भी नहीं सोचता था. बोर्डिंग स्कूल भेजना तो असंभव ही था. इसके बावजूद हमें घर से मीलों दूर लाहौर क्वीन मेरीज  कॉलेज में भेज गया जो दुसरे प्रान्त में था. उन दिनों यह दुसरे देश में जाने जैसी बात थी. जब मेरी माँ की मृत्यु हुई तो वो साफ़-साफ़ निर्देश छोड़कर गयी थी कि उनकी संपत्ति से मिलने वाले पैसों का उपयोग उनके बच्चों, खासतौरपर उनकी बेटियों की पढाई के लिए किया जाये. जोहरा ने 1929 में दसवीं पास करने के बाद स्कूल छोड़ा। इसके बाद मैंने तूफ़ान से सीधा मुकाबला करने का फैसल  किया। शादी का कोई इरादा नहीं था. 1930 में अपने मामा के साथ कार से यूरोप की यात्रा पर निकल पडी.  1933  में जर्मनी से डांस का प्रशिक्षण लेकर भारत लौटीं। 1935 में उदयशंकर भट्ट से मुलाक़ात हुई. मेरी ज़िन्दगी के सबसे सार्थक और मस्ती भरे दौर में से एक की शुरुआत अब हुई. उदयशंकर की मंडली के साथ विदेश का दौर किया। 1939 के मार्च में भट्ट ने अल्मोड़ा में अपना सांस्कृतिक केंद्र खोला। जोहरा ने इस केंद्र के लिए 5 साल के कोर्से का पाठ्यक्रम तैयार किया। वे वहां कक्षाएं भी लेती थीण् उसी केंद्र में उनकी मुलाक़ात कामेश्वर सहगल से हुई जो उनसे उम्र में कई साल छोटे थे और भट्ट के केंद्र में प्रक्षिक्षण ले रहे थे. अध्यापिका और छात्र  का रिश्ता दोस्ती एवेम प्रेम और शादी में तब्दील हुआ. हमदोनों  चूँकि अलग-अलग धर्मों के थे इसलिए हमारी शादी एक रजिस्ट्रार के द्वारा होनी थी. इस्के लिए रजिस्ट्रार  ने घर आकर कानूनी कार्यवाही पूरी की, यह दिन था 14 अगस्त 1942 और समय था दोपहर का.   

कामेश्वर अपना स्कूल खोलना चाहते थे. 1943 में दोनों ने केंद्र छोड़ दिया और देहरादून जोहरा के पिता के पास आ गए. 1944 में बेटी किरण का जन्म हुआ. अपना स्कूल खोलने के लिए पंजाब की सांस्कृतिक राजधानी लाहौर को चुना। नाम रखा जोरेश दोनों के नामो को मिलाकर। मार्च 1945 में शो के लिए देश का दौर शुरू किया। जुलाई में जब वापस लाहौर लौटे तो माहौल बदल चुका था. जब हम लाहौर वापस पहुचे तो तो पाया कि देश के बंटवारे की सम्भावना के चलते पंजाब असंतोष की आग में जल रहा है्‌. हमारे पुराने मुसलमान दोस्त हमें कुछ शक की निगाहों से देखने लगे थे. नए बनने वाले पकिस्तान में हम जैसे हिन्दू.मुसलमान पति.पत्नी के लिए कोई जगह नहीं होगी. हमने महसूस किया कि इससे पहले कि कोई खतरा हम तक पहुचे, हमें यहाँ से दूर चले जाना चाहिए।1945  में दोनों बॉम्बे पहुंचे। वहां आते ही जोहरा इप्टा  में  शामिल हो  गयी थी और इसके नाटकों में  बड-चढ़ कर हिस्सा लेती थी. वे इप्टा की उपाध्यक्ष भी चुनी गयी थी. पृथ्वीराज कपूर और उनकर पृथ्वी थिएटर से जोहरा का गहरा जुड़ाव था. पृथ्वीराज को वे पापाजी कहती थी और उनके प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था.  जोहरा पृथ्वी थिएटर से तब तक जुडी रही जब तक थिएटर जिंदा रहा. 1960  में थिएटर बंद हुआ. 1953  में बेटे पवन का जन्म हुआण् बच्चों की ज़िम्मेदारी के साथ.साथ जोहरा लगातार सक्रिय रही. विदेश यात्राये व् लन्दन में 1962 से 1973 तक का प्रवास उसके बाद दिल्ली। मुश्किल समय में उन्होंने क्लर्क की नौकरी भी की. उनकी ज़िन्दगी का सफ़र आसान नहीं था लेकिन परिस्थितियों के सामने उन्होंने घुटने नहीं टेके। 

जोहरा ने बड़ी बेबाकी से अपने नजदीकी लोगों की कमजोरियों को भी उजागर किया है. मसलन पृथ्वीराज कपूर का अपनी बेटी उम्मी को थिएटर में काम करने की अनुमति न देना उनके दोहरे मापदंडों का परिचायक है. जब कि वह हमेशा इस काम को इज्ज़तदार बनाने पर जोर देते थे और उन्होंने थिएटर में काम करने वाली हम सभी औरतों की हमेशा तारीफ की थी और इज्ज़त दी थी. पति कामेश्वर की आत्महत्या ने उन्हें हिल कर रख दिया था. बड़ी मुश्किल से वे अपनी ज़िन्दगी को वापस पटरी पर ला पायी थी. एक प्रगतिशील और संवेदनशील इंसान भी किस प्रकार  पत्नी की सफलता को सहज स्वीकार नहीं कर पाताए  यह उसकी पितृसत्तात्मक सोच का नमूना है, इसे जोहरा ने स्वयं भी स्वीकार किया ह.मैं अक्सर सोचती हूँ कि अगर कामेश्वर ने मुझसे शादी नहीं की होती तो क्या उनकी ज़िन्दगी किसी और तरीके से ख़त्म हुई होती। वह अति संवेदनशील इंसान थे जो कभी भी इस बात को मान नहीं पाए कि उनकी बीवी अपने काम में लगातार कामयाबी और इज्ज़त हासिल करती जा रही है जब कि उनकी खुद की कामयाबी जो हालाकि कहीं ज्यादा ऊँचे दर्जे की थी, रुक-रुक कर उन्हें मिली. जोहरा ने अपने बच्चों की ज़िम्मेदारी अकेले निभाते हुए उन्हें आत्मनिर्भर बनाया लेकिन कभी उनके ऊपर निर्भर नहीं हुई न उन्होंने बच्चों की ज़िन्दगी में दखलंदाज़ी की न अपनी ज़िन्दगी में किसी तरह की दखलंदाज़ी बर्दाश्त की.    

जोहरा की आत्मकथा वह आधुनिक मूल्यबोध देती है जिसमे बराबरी, निजी स्पेस का सम्मान और गरिमा है. ज़ोहरा की बीहड़ यात्रायें उनके बीहड़ व्यक्तित्व का परिचायक है. उन्होंने ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जी तो उसकी कीमत चुकाने को भी तैयार रही. अगर अपनी सफलताओं का श्रेय लिया तो असफलताओं की ज़िम्मेदारी भी उठायी। दुखों के बावजूद हमेशा अपने लिए कोई न कोई लक्ष्य तलाश कर जीवन को सार्थक बनाये रखने के लिए वे लगातार काम करती रहती थी। उन्होंने खतरे मोले लिए, तकलीफें उठाई तो ज़िन्दगी का लुत्फ़ भी उठाया। ज़िन्दगी का असली मज़ा शायद तभी उठाया जा सकता है जब उसकी चुनौतियों से भी रूबरू हुआ जाये।जोहरा कोई क्रांतिकार या कोई सेनानी नहीं हैं लेकिन उनका जीवन उर्जा और प्रेरणा देता है, ज़िन्दगी जीने का सलीका सिखाता है खासतौर पर महिलाओं के लिए जिनकी ज़िन्दगी किसी न किसी हद में सिमटी हुई है. किसी की हद छोटी है तो किसी की कुछ बड़ी, मगर इस हद से निजात नहीं। जोहरा का जीवन इस बात का सबूत है कि ज़िन्दगी के मसलों से दो-चार होकर ही उसकी राह बनती है. बकौल जोहरा हालाँकि मुझे लगता है कि  मुझे कुछ कम मिला लेकिन मैंने अपने लिए थोड़ी सी पहचान बनायीं, बहुत सारा तजुर्बा कमाया और कड़ी मेहनत के बावजूद अपने काम से बेपनाह खुशियाँ पाई और क्या चाहिए, मै इसे ऐसा ही चाहती थी.

              

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