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Monday, September 21, 2020

स्त्रियों के लिए टायलेट की कमी - तकनीकी समाधान से परे जाने की जरूरत

 - अंजलि सिन्हा


 Image Courtesy- DNA newspaper


समस्या जब सिर पर आए तो उसका फौरी तकनीकी किस्म का समाधान ढूंढने  में जुटे लोगों से यह अपेक्षा न करें कि वह बतायें कि अमुक समस्या क्यों है और उसका सही न्याय पूर्ण और स्थाई समाधान क्या होना चाहिए ?

बात है महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों, सड़कों, पार्कों, हाट-बाजारों आदि सभी जगह पर्याप्त संख्या में शौचालयों की उपलब्धता की। यह मुददा पुराना है लेकिन समाधान अभी भी नहीं हुआ। अब कोविड समय में जब सार्वजनिक शौचालयों में ताला लग गया तो ऐसे समय में भी जो अपनी ड्यूटी सड़क पर या किसी अन्य खुले स्थान पर, तब लगभग दो दशक पहले बने एक उपकरण ‘शीवी’ (Shewee) की बिक्री में अचानक जबर्दस्त इज़ाफा देखा गया है।

Monday, September 14, 2020

Menstruation: Unpacking the myth

- Ananya



Imagine a state where all colours have lost their meaning. Where the vermilion on my forehead fails to convey my commitment towards the better sex, where my residence in a red light area is not described in sense of some obscene nocturnal place celebrating and upholding the fragile masculinity and where the red patch on my cloth does not convey the original sin of being born a human but identified as a gendered male envying women.

Friday, September 11, 2020

सवाल तो साफ़ है पर नीयत में खोट

 - अर्पिता श्रीवास्तव 

                         परिपक्व संविधान की इबारत २६ जनवरी, १९५० से हमारे सामने है, उसे पढ़ने, समझने, देखने के अनगिनत नज़रिए हमारे सामने है पर हर बार जब कोई असमानता/ग़ैर-बराबरी की दुर्घटना घटती है, जब कोई न्याय मांगती आवाज़ को सरकार और प्रशासन की मिली-भगत से दबाया जाता है, जब कोई जेंडर मुद्दों पर अपनी क्रूरता, असंवेदनशीलता का उदाहरण पेश करता है,ज़ेहन में यही सवाल आता है कि आख़िर सवालों के घेरे में हम कब तक गोल-गोल चक्कर लगाते दिन के बाद दिन, बरस दर बरस तय करते चलेंगे, आख़िर कब हम संवेदनशील समाज बना पायेंगे? समय के साथ जिन बातों को इतिहास की बात बन दफ़्न हो जाना था वह एक लंबे समय से और वर्तमान में सबसे ज़रूरी मुद्दा बन चुका है. हर बात, हर मुद्दे को एक ख़ास कोण से देखने की गजब प्रतिभा हमारे देश ने अर्जित कर ली है. उस ख़ास कोण में धर्म, जाति और जेंडर ने लोगों को क्रूरता की ललित कला विकसित करने में महारत दे दी है. ये ऐसी बातें हो गई हैं जो रोज़मर्रा की छोटी सी छोटी गतिविधियों का हिस्सा हो गई हैं.

Saturday, September 5, 2020

प्रतिनिधित्व का सवाल: कुछ और पहलू

 -अंजलि सिन्हा



‘‘अब कौनसा ऐसा क्षेत्र या काम बचा है जहां महिलायें नहीं हैं। भले वह संख्या में कम हो, लेकिन महिला समुदाय का प्रतिनिधित्व तो कर रही हैं !" उसने कहा। उसके कहने का तात्पर्य यह था कि जब सभी जगह वे मौजूद हैं तो फिर जेण्डर बराबरी क्यों नहीं है ? अभी भी औरतें क्यों हिंसा, दमन, और शोषण का सामना कर रही हैं ? इस साधारण से लगनेवाले प्रश्न ने सोचने के लिए बाध्य किया कि प्रतिनिधित्व की हमारी मांग किस लिए थी ? क्या उसके द्वारा जेण्डरगत न्याय और बराबरी भी नहीं मिल सकती थी क्या ?

Monday, August 31, 2020

रोज अनसुनी रह जाती हुई चीखें

 - अपर्णा

https://www.youtube.com/watch?v=scwYray2Dsk - link to movie


कोविड-19 के प्रभाव ने हमारे सामने दुनिया को देखने का अलग नज़रिया दे दिया है । कहा यह भी जा सकता है कि उसने चीजों , स्थितियों और मनुष्यों के प्रति हमारे नज़रिये को बदलने को हमें मजबूर कर दिया है । समय न होने के पूंजीवादी मंत्र को उसने तहस-नहस कर दिया । मार्च से अब तक के लगभग पाँच महीनों  में समय न होने का मिथक टूट गया है । संसद , न्यायपालिका सबकुछ ठप और कॉर्पोरेट भी चारों खाने चित्त । उसने सबसे पहले अपनी जवाबदेहियों से पल्ला झाड़ा और फिर सामाजिक जिम्मेदारियों से भी । अपने लिए सुविधाजनक वर्क फ्राम होम की गुंजाइश निकाली । कोविड ने दुनिया को घरों में समेट दिया। इसके अनेक भयावह पक्ष हैं जो समाज के अनेक संस्तरों पर अलग-अलग तरीके से प्रभाव डालते हैं । इसका सबसे नकारात्मक प्रभाव स्त्रियॉं पर पड़ा है । वे समाज के हरेक संस्तर पर शोषण , दमन और हिंसा का शिकार हुईं । कहीं उनके लिए रोजगार की समस्या खड़ी हुई तो कहीं पारिवारिक अत्याचार की । मध्यवर्ग की स्त्रियाँ भी इससे अछूती नहीं रहीं । इसी विषय को लेकर प्रख्यात अभिनेत्री नन्दिता दास ने सात मिनट की एक लघु फिल्म–लिसन हर (उसको सुनो) बनाई । फिल्म की कहानी कुल इतनी है कि नन्दिता दास कोरोना काल में वर्क फ्राम होम कर रही है । बीच में बच्चे को खेल और पढ़ाई संबंधी निर्देश देती रहती है । बच्चा माँ के साथ ही अधिक दिखता है । दूसरे कमरे में मौजूद पिता से उसका कोई खास सरोकार नहीं दिखता । कुरियरवाला आता है तब भी दरवाजा पत्नी खोलती है । पति अंदर से आदेश देता है । फिल्म का हुक पॉइंट यह है कि नन्दिता दास के फोन पर बार बार एक अन्य महिला का फोन आता है और उधर से पुरुष के डांटने-फटकारने-मारने की आवाज आती है और स्त्री बचने की कोशिश करते हुये चीखती है । वह फोन पर नन्दिता दास से सहायता की गुहार लगाती है । नन्दिता दास के सामने दोहरा संकट है । उस पर वर्क लोड है लेकिन वह संवेदनशील स्त्री है । झुंझलाहट के बावजूद फोन को इगनोर करना उसके लिए असंभव है । लिहाजा वह न केवल फोन सुनती है बल्कि पुलिस को फोन करती है जहां से उदासीन जवाब मिलता है और अधिक ज़ोर देने पर यह कहा जाता है कि पुलिस को अपनी ड्यूटी खूब पता है कि उसे क्या करना चाहिए । अंततः वह महिला को कॉलबॅक करती है । फोन महिला का पति उठाता है गुस्से में कहता है रांग नंबर । फिल्म खत्म हो जाती है ।