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Saturday, March 6, 2021

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर : हमारी विरासत, हमारी चुनौतियां - अंजलि सिन्हा

 


Women's demonstration for bread and peace – March 8, 1917, Petrograd, Russia

8 मार्च अन्याय और गैरबराबरी के खिलाफ एकजुट होने, प्रतिरोध करने और सत्ता के सामने चुनौती पेश करने का प्रतीक दिवस बन गया है।  यह जहां से और जब से शुरू हुआ उसमें समय के साथ बहुत सारे मुद्दे जुड़ते गए। हर देश और समाज 8 मार्च के इतिहास को याद करते हुए अपने यहां के मुद्दे और समस्याओं के खिलाफ खड़े होने, अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए संकल्पबद्ध होता है। संघर्ष की इस लंबी परंपरा से हम सभी को और पूरी मानवता को बहुत कुछ नया हासिल होता रहा है और भविष्य में इस संघर्ष यात्रा में हमारे क्या मुद्दे और मांगें होंगी इसकी भी झलकी पेश करता है।


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाना किस तरह शुरू हुआ इस पर सरसरी निगाह डालना समीचीन होगा।

1845 में अमेरिका के दो शहरों में सूती कपड़ा मिल की महिला मजदूरों ने काम के घंटे 12 से 10 करने के लिए हड़ताल की जिसमें 5,000 महिलाओं ने भाग लिया।

1848 में मजदूरों ने काम के घंटे कम करने के लिए फिर हड़ताल की।

8 मार्च 1857 में न्यूयॉर्क के टेक्स्टाइल उद्योग की कामगार महिलाओं का विशाल प्रदर्शन हुआ। सैकड़ों की संख्या में शिकागो की सड़कों पर महिलाएं उतरीं और उन्होंने आवाज़ उठायी कि हमें 12 से 16 घंटे तक काम करने के लिए मजबूर मत करो।

10 घंटे काम करने की मांग की गयी तथा साथ ही फैक्टरी काम मे - पालनाघर/क्रेश जैसी - कुछ और सहूलियतों की भी मांग उठी ।

पहली बार इतने बड़े पैमाने पर संगठित होना और अपनी मांग पर जीत हासिल करने की खुशी महसूस की हमारी इन पुरखिनों ने।

1888-1889 में ब्रिटेन की माचिस बनाने वाली फैक्टरी की महिला श्रमिकों ने हड़तालें कीं।

बीसवीं सदी में ही महिलाओं के वोट देने के अधिकार को लेकर मांग उठी। 1907 में समाजवादियों के पहले सम्मेलन में ही क्लारा जेटकिन ने सीमित मताधिकार की जगह सार्विक मताधिकार की मांग रखी यानि सभी को वोट देने की मांग बुलंद की।

फिर 1908 में 8 मार्च के ही दिन न्यूयॉर्क में कामगार महिलाओं का प्रदर्शन हुआ जिनकी संख्या 15 हजार बतायी जाती है। उनकी मांगें थी वेतन बढ़ोत्तरी, काम के घंटे कम करने और मताधिकार की।

वर्ष 1909 में अमेरिका की कमीज बनानेवाली फैक्टरी की महिला कामगारों ने हड़ताल की जिसमें 20,000 महिलाओं ने हिस्सा लिया।

28 फरवरी 1908 को सोशलिस्ट पार्टी ऑफ  अमेरिका ने आहवान किया कि राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाए। 30 हजार महिला कामगारों ने हाड कंपा देने वाली ठंड में सड़कों पर प्रदर्शन किया।

1910 में जर्मनी के कोपेनहेगन में सोशलिस्टों का दूसरा सम्मेलन हो रहा था। जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की अग्रणी नेता क्लारा जेटकिन ने सम्मेलन में प्रस्ताव रखा कि 8 मार्च का हर साल महिला कामगारों के अधिकारों के लिए महिला दिवस मनाया जाए। इस सम्मेलन में 17 देशों की सौ प्रतिनिधि शामिल थीं, जो इस रणनीति से सहमत थी कि महिलाओं के समान अधिकार को बढ़ावा दिया जाए, जिसमें उनके मताधिकार का मसला भी शामिल हो।

सम्मेलन में प्रस्ताव पास हो गया और तब से यह दिन स्त्रियों के हक़ के लिए आवाज़ उठाने का दिन बन गया। 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और जर्मनी में एक साथ महिला दिवस मनाया, जिसमें लगभग दस लाख महिलाओं ने हिस्सा लिया।

1912 में अमेरिका में परिधान बनानेवाली कंपनी रोजेज लॉरेन्स के मजदूरों ने हड़ताल की जिसका फोकस वेतन बढ़ाने और काम के घंटे कम करने पर था। इस आंदोलन के चलते सैकड़ों महिलाओं को जेल में डाल दिया गया, लेकिन बाद में उनकी मांग मानी गयी।

वर्ष 1914 में जर्मनी में  अंतर्राष्ट्रीय  महिला दिवस पहली दफा मनाया गया, जिसका फोकस महिलाओं के मताधिकार पर था, जो 1918 में ही महिलाआों को हासिल हुआ। इसी साल लंदन में भी महिलाओं के मताधिकार को केन्द्र में रखते हुए 8 मार्च मनाया गया। बो से टाफलगार स्क्वेयर तक चले इस जुलूस को संबोधित करने जाते हुए जानीमानी कार्यकर्ती सिल्विया पैंकहर्स्ट को गिरफ़्तार  किया गया।

वर्ष 1917 में रूस के टेक्स्टाइल उद्योग की कामगार महिलाओं के 8 मार्च / तत्कालीन रूसी कैलेण्डर के हिसाब से 23 फरवरी/ के जुलूस को रूस में विकसित हुई क्रांति में विशेष तौर पर रेखांकित किया जाता है। इसी दिन सेन्ट पीटसबर्ग की महिलाएं ‘रोटी और शांति’ की मांग को लेकर, प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति की आवाज़ बुलंद करते हुए और जारशाही के खातमे की मांग करते हुए हड़ताल पर गयीं। वहां सफल अक्तूबर क्रांति के बाद 8 मार्च को आधिकारिक तौर पर अपनाया गया और उस दिन छुट्टी घोषित की गयी।

ऐसा नहीं था कि इससे पहले कोई संघर्ष नहीं चल रहा होगा। हर देश काल में कहीं छोटा तो कहीं बड़ा अपने ही ढंग से प्रतिरोध के प्रयास तो चल ही रहे होते हैं, लेकिन ज्ञात इतिहास में यह सबसे बड़ा संगठित प्रतिरोध था।

ये संघर्ष और प्रतिरोध के प्रयास हमारी विरासत हैं, इस विरासत को आगे बढ़ाना वर्तमान पीढ़ी का काम है।

क्या हम इसके लिए तैयार हैं ?

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एक काम शायद जरूरी है मुद्दों के बीच बने विभाजन को पाट देना, गलतफहमियों को दूर करना और व्यापक एकता के सूत्र ढूंढना

जैसे आम धारणा यह है कि फलां फलां मुद्दा जेण्डर का मुद्दा है, महिलाओं का मुद्दा है और इसलिए अपेक्षा यह बनती है कि जब उनका मुददा है तो इसके खिलाफ आवाज भी तो वहीं उठाएंगी !

ये महिलाओं का मुद्दा क्या है ? यौन हिंसा, घरेलू हिंसा का मुद्दा, दहेज या घर से निकाल देने आदि या रसोई गैस महंगा हो जाना, मात्र शिशु का स्वास्थ्य ! ... आदि

जब यौन हिंसा तथा बलात्कार एवं बर्बर हत्या की घटना घटती है तो पूरे समाज को ‘‘बेचारी’’ महिलाएं याद आ जाती हैं और लोग सड़कों पर आते हैं, लेकिन फिर दूसरी घटना सामने आने तक के लिए वापस चले गए होते हैं। घरेलू हिंसा या दहेज आदि के लिए तो अब गुस्सा भी नहीं फूटता है। हां, महिला समुदाय को अलग से सम्बोधित करना है तो इसके प्रति काफी जागरूकता आ गयी है। चुनावी राजनीतिक पार्टियां तो ऐसा करती ही हैं बाज़ार का हर हिस्सा इस पर ठीक से नज़र रखता है और अपनी रणनीति भी बनाता है चाहे वह अख़बार पत्रिकायें हों, टीवी चैनल हों, सोशल मीडिया हो या पत्रिकायें हों कोई प्रॉडक्टस बनाने वाली कंपनियां हों ये सभी महिलाओं का अलग संसार बनाने में लगे हैं, उनका चॉइस तैयार करने और आज़ादी का मतलब समझाने में कि क्या खरीदकर या क्या इस्तेमाल करके आप क्या महसूस कर सकती हैं।

लेकिन जहां तक महिलाओं की अपनी बात है तो समाज का हर मुद्दा उनका अपना है और वे हर जगह शामिल होने का प्रयास कर रही हैं, कहीं कम तो कहीं ज्यादा। खेती किसानी का मसला तो अभी सीधे दिख रहा है कि किसान आंदोलन में उनकी भागीदारी कैसे है ? वैसे वे किसान तो पहले भी थी लेकिन आंदोलन में ऐसी भागीदारी अभी ठीक से हो पायी है। नोदीप  कौर का नाम तो हम सब उनकी गिरफतारी के बाद जान गए, लेकिन ऐसी युवतियों, महिलाओं की तादाद बहुत है। घटना स्थल पर रसोई से लेकर मंच तक, सांस्कृतिक फेरों से लेकर सड़क पर सफाई तक सब जगह अपनी भूमिका और जिम्मेदारी निभा रही हैं।

और सीएए विरोधी आंदोलन को भी देख लीजिए कैसे महिलाओं ने - खासकर बुजुर्ग महिलाओं ने और वह भी लंबे समय तक परदे तक सीमित रही ऐसी महिलाओं ने - मोर्चा संभाला था। और जनता की मांगों के लिए, वंचितों, पीड़ितों, अल्पसंख्यकों के सवालों के लिए लड़ते रहने के चलते जेल भेजी गयी और तमाम दमनकारी कानूनों के तहत वहां बंद रखी गयीं युवतियों, स्त्रियों की तादाद कम नहीं है। देवांगना, नताशा, सफूरा, गुलफीशा जैसी युवतियां हैं जो एक नया अध्याय लिख रही है। जल जंगल जमीन पर्यावरण जलवायु परिवर्तन ऐसे मसलों को देखें तो दिशा रवि जैसी तमाम लड़कियां एवं लड़के सक्रिय हुए हैं, निश्चित ही पर्यावरण का मुद्दा सिर्फ महिला मुद्दा नहीं है।

महिलायें महिला उत्पीड़न के मसले पर तो काम कर रही हैं क्योंकि वे रोज उनका सामना करती हैं जैसे हाल में प्रिया रमानी केस का नाम सबने  खूब सुना। सार्वजनिक दायरे में कार्यस्थलों को सुरक्षित बनाने का मसला गंभीर बना हुआ है जबकि यह लड़ाई दशकों पुरानी हो गयी है। इस तरह ना तो घर के अंदर वाला काम पूरा हुआ है, जहां घरेलू हिंसा विभिन्न रूपों में जारी है, ना ही घर के बाहर वाला काम पूरा हुआ है जिसमें समान अवसर श्रमबल हो, यौनिक हिंसा से सुरक्षा तथा बराबरी का मामला भोंडे रूपों में मौजूद है।

यह काम और लड़ाई जिसे महिला मुद्दा समझा जाता है , वह पूरे समाज का मुददा है न कि सिर्फ महिला संगठनों का।

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अंतर्राष्ट्रीय  महिला दिवस मनाते हुए, अन्याय, अत्याचार के खिलाफ संघर्ष के इन दिनों में और एक बेहतर समतामूलक समाज की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी के इस दौर में हमें इन सभी पहलुओं पर और बाकी छुटे पहलुओं पर सोचना है।

1845 की अमेरिका की सूती कपडा मिलों की अनाम मजदूरिनें हों या अपने यहां स्त्रियों के जीवन में फैले अंधेरे को दूर करने के लिए अलख जगानेवाली फातिमा शेख-सावित्रीबाई फुले के संघर्ष हों, हम सभी उनकी सच्ची वारिस तभी बन सकती हैं जब हम अपने समय की चुनौतियों को पहचाने और उससे लड़ने के लिए नयी ऊर्जा के साथ उतरें।

Sunday, February 14, 2021

किसान आंदोलन और स्त्री अपनी सांचाबंद शैली को तोड़ कर आगे आती महिला किसान

-अंजलि सिन्हा 




हर जनांदोलन नयी नयी छवियों का निर्माण करता है। शाहीनबाग आंदोलन ने संविधान की रक्षा के लिए खड़ी हुई अल्पसंख्यक समाजों की दादियों को जहां केन्द्र में ला दिया था, तो वर्तमान शासन के लिए चुनौती बने किसान आन्दोलन ने इसी तरह कई सारी छवियां को लोकप्रिय किया है।

इन्हीं में से एक छवि टैक्टर पर बैठी उस स्त्री  किसान की है, जो आत्मविश्वास से भरपूर न केवल ट्रेकटर चला रही है बल्कि अपनी सहेलियों को टैक्टर चलाने का प्रशिक्षण देने वाली भी है। निश्चित ही यह महज फोटो के लिए खींची तस्वीर नहीं है, इस बार सभी ने इस आन्दोलन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को देखा है।

Saturday, February 13, 2021

प्रेम का पालतू हो जाना....

- रूपाली सिन्हा 




"प्रेम व्यक्ति के भीतर एक सक्रिय शक्ति का नाम है। यह वह शक्ति है जो व्यक्ति और दुनिया के बीच 
दीवारों को तोड़ डालती है, उसे दूसरों से जोड़ देती है।"
-एरिक फ्रॉम

प्रेम हमेशा से ही चुनौतीपूर्ण रहा है, इसके तेवर हमेशा से ही बाग़ी रहे हैं। यह हर तरह की सामाजिक
बंदिशों को चुनौती देता रहा है-अमीर- ग़रीब, ऊँच- नीच, छोटा-बड़ा आदि। जब इन चुनौतियों से टकरा कर 
वह सामाजिक नॉर्म्स को तोड़ता है तो उसकी सज़ा भी मुक़र्रर होती है। इतिहास में ऐसे उदाहरण के रूप में 
सोहनी-महिवाल, हीर-रांझा, लैला-मजनूँ दिखाई देते हैं तो आजकल यह ऑनर किलिंग के रूप में दिखता है।
फिल्मों में भी इसका प्रतिबिम्बन दिखता है। आपको 'क़यामत से क़यामत तक', 'एक दूजे के लिए', 'इशकज़ादे' 
याद ही होंगी। मिसाल स्थापित कर यह सबक़ सिखाया जाता है कि नॉर्म्स के ख़िलाफ़ जाओगे तो यही हश्र होगा। 
लेकिन ये सब प्रेम के विद्रोही तेवर थे।

Wednesday, January 13, 2021

वर्क फ्रॉम होम ‘घर से काम कीजिए !’


- अंतहीन चुनौतियां या संभावनाओं के खुलते द्वार !

- अंजलि सिन्हा



महामारी ने कई अन्य बातों के अलावा एक पुराने ही शब्द ने हम सभी के जीवन में एक 
गहरी पैठ बना ली है, 

घर से काम कीजिए, वर्क फा्रॅम होम!

जब आप घर बैठे दफ्तर का काम कर सकते हैं तो इससे बढ़िया क्या हो सकता है - न यात्रा 
का झंझट, ना यात्रा खर्च का ना ही कपड़ों की विविधता बनाए रखने की चिन्ता
 आदि-आदि और घर ग्रहस्थी भी साथ-साथ निभा ली जाए।

Friday, December 25, 2020

रूपरेखा वर्मा का स्त्री सम्मान दिवस पर बलात्कार की अपसंस्कृति पर वक्तव्य


                                            बहुत विनम्र महसूस कर रही हूँ, मुझे शर्म भी आ रही है, मैं आपकी इस लंबी-चौड़ी तारीफ़ को इस अर्थ में ले रही हूँ अगर मैं कभी आराम करना भी चाहूं और अगर शरीर और दिमाग चल रहा है तो मैं आराम न करूं, आपका यह आदेश सिर आँखों पर. आज की जो आपने थीम चुनी है उसके लिए मैं स्त्री अधिकार संगठन ( पूर्व में स्त्री मुक्ति संगठन इस नाम से भी काम किया है) शुक्रिया करना चाहूंगी, जबसे यह बना है तब से मैं इसके काम को जानती हूँ , बहुत अच्छा काम आप लोगों ने किया है आगे भी करेंगे पूरा विश्वास है. आपने मेरा जो सम्मान किया मैं उसका भी और आज जो बुलाया है उसका भी शुक्रिया करती हूँ. आज के लिए जो आपने थीम चुनी है निश्चित रूप से कुछ समय से जो बलात्कार की संख्या बढ़ी है और उसका जो रूप है वह भयावह हुआ है तो यह एक सही बात है कि हम इस विषय पर जब कोई ख़ास मौके हों तो इस पर ज़रूर चर्चा करें.