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Wednesday, August 30, 2017

LONG ROAD AHEAD!

-Noor Zaheer


Every time Triple Talaq is discussed, talked about or analyzed two questions invariably crop up. One, that data shows there is a higher percentage of divorce happening among Hindus than Muslims and the other being that the demand for doing away with instantaneous triple talaq does not address the short comings of the woman who might be responsible for putting the man in such a situation that he is forced to divorce her.
Both views are inter-related. The demand is for abolishing instant talaq and not talaq per se. The women are not raising a moral issue whether talaq should be in existence or not; nor are they saying that marriages once contracted should never be dissolved. Islam accepts that marriage is a contract between two people and the desire to end the contract is neither immoral nor illegal. It is the one sided authority and the vulgar haste by which the end is brought about which is being contested. 
The view that a woman conducts herself in such a way that a man is forced to divorce her puts the entire responsibility of being divorced on the woman. Accepting that this might be the case one can still demand that a procedure should be followed, the woman given enough notice to contest and put across her side of the story; a right which is totally denied in the case of instantaneous triple talaq which leaves no room for the man to back track, review or resume the relationship.     
  
It is this instantaneous Triple Talaq against which Shayara Bano had filed a petition on which the honorable Supreme Court has pronounced its decision and it has gone in favour of Muslim women. 

Sunday, March 5, 2017

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस कार्यक्रम




दुनिया भर की शोषित-पीड़ित महिलाओं की मुक्ति का उत्सव आठ मार्चअन्तरराष्ट्रीय महिला दिवससमूची दुनिया में धूमधाम से मनाया जाता है। आज के दिन दुनिया के तमाम छोटे-बड़े शहरों, नगरों, कस्बों में महिलाएं सड़कों पर उतरती है, रैलियां करती हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं और स्त्री मुक्ति के अधूरे संघर्ष को पूरा करने का अपना संकल्प दोहराती हैं। यह दिन दुनिया की महिलाओं के लिए अन्याय तथा शोषण के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक दिन है तथा साथ ही जीत के जश्न का भी है। 1857 में इसी दिन को पहली बार संगठित रूप में महिलाएं शिकागो की सड़कों पर उतरी थीं। उन्होंने अपने फैक्टरी मालिकों से अपने काम घंटे 16 से घटा कर 10 घंटा करने की तथा अपने नन्हें बच्चों के लिए पलनाघर आदि सुविधा की मांग की थी। बाद में 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन शहर में समाजवादियों के सम्मेलन में जानीमानी नेता क्लारा जेटकिन के प्रस्ताव पर इस दिन को महिला दिवस के रूप में मनाने का तय किया गया। फिर 1975 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी इस पर अपनी मुहर लगायी। धीरे धीरे यह दिन दुनिया भर में प्रचलित हो गया।

Wednesday, February 15, 2017

प्रेम के लिए क्रांति और क्रांति के लिए प्रेम



प्रेम के विविध रंग!




एक तरफ बाज़ार, प्रेम को हीरे-मोतियों में तोल रहा है, चाकलेट में घोल रहा है। दूसरी तरफ प्रतिगामी,क्षुद्र और संकीर्ण ताकतें प्रेम से डरा रहीं हैं :- जिहाद के नाम पर, इज़्ज़त के नाम, संस्कृति और धर्म को बचाने के नाम पर !! ऐसे में प्रेम करना किसी युद्ध से कम नहीं।

Friday, December 2, 2016

महिला कर्मचारियों के असमान वेतन: ताकि मुददआ तो बदले

- अंजलि सिन्हा
 
बीते सोमवार को फ्रांस की राजधानी पैरिस के तमाम जानेमाने राजनीतिक और सांस्क्रतिक कार्यालयों की महिला कर्मचारियों ने ठीक साडे चार बजे अपना काम रोका। यह उनका विरोध का तरीका था ताकि पुरूषों की तुलना में महिलाओं को मिलते कम वेतन का मुददा रेखांकित हो सके। दरअसल महिला अधिकारों की हिमायत में संचालित एक नारीवादी न्यूजलेटर ने महिला कर्मचारियों को आवाहन किया था कि वह अपना काम रोक दे। पुरूष एवं स्त्राी कर्मचारियों के बीच आज भी मौजूद असमान वेतन को देखते हुए न्यूजलेटर ने कहा था कि 7 नवम्बर के आगे बाकी बचे साल तक महिलाएं काम करती भी रहें तो यह एक तरह से ‘स्वैच्छिक काम’ होगा क्योंकि उन्हें उतना वेतन कम मिलता है। /ीhttps://www.theguardian.com/world/2016/nov/07/french-women-walk-out-work-pay-disparity-gender-pay-gap-equality/

Sunday, November 6, 2016

Annual Workshop Report


Stree Mukti Sangathan has organised its 17th workshop from 8-10 October, in Naugarh, Varansi, Uttar Pradesh. The workshop had four main sessions and each session had a brainstorming discussion. About seventy women raging from students to working women and activists participated in the workshop. The idea behind these sessions was to enhance our understanding on the emerging political and theoretical issues and share experience of the different groups and to learn from their experience.  The short description of each session is given here;